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बिहार में जहरीली शराब से 39 की मौत, PHC के डॉक्टर ने की 47 मरीज भर्ती होने की पुष्टि

नई दिल्ली। बिहार में नकली शराब पीकर मरने वालों की संख्या अब 39 हो चुकी है। इसे लेकर विधानसभा में गुरुवार को सीएम नीतीश कुमार का बयान भी आया। हालांकि, इससे पहले तक सरकारी तंत्र ने शराब से मौत नहीं स्वीकारने की बात कहता रहा। सारण के सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्र के मुताबिक, अस्पताल में 47 लोग भर्ती हैं। इनमें से कई लोगों में नकली शराब पीने के बाद होने वाले लक्षण देखे गए हैं।

पीएचसी के डॉक्टर संजय कुमार ने बताया कि अस्पताल आए कई लोगों को देखने में समस्या आ रही थी। कई लोगों का इलाज जारी है। इसके अलावा कुछ लोगों को प्राथमिक उपचार के बाद घर भेज दिया गया। उन्होंने कहा कि अगर लक्षण और गंभीर होते हैं तो मरीजों को सदर अस्पताल रिफर किया जाएगा।

हमारे पास अलग-अलग स्रोतों से मृतकों के 35 नाम हैं, जिनमें 28 का पूरा पता उपलब्ध है। अभी आंखों की रोशनी गंवाने वाले लोगों को छिपाने का खेल चल रहा है, क्योंकि मरने वालों में इस बार भी वैसे लोग ज्यादा हैं जिनकी पहले आंखों की रोशनी गई। वैसे, कुछ जिम्मेदार खुद भी कह रहे हैं कि लोग शराबबंदी के केस में फंसने के डर से खुद सामने नहीं आ रहे। स्थिति बिगड़ने पर ही आ रहे और देर होने के कारण जान नहीं बच पा रही है।

डीएम के पोस्टमार्टम ऑर्डर‘ के लिए रात में पड़े रहे शव

सारण जिला मुख्यालय छपरा स्थित सदर अस्पताल में मौतों की पुष्टि होती रही और पोस्टमार्टम के लिए बुधवार को लाइन लगी रही। यह लाइन बुधवार शाम रुक गई। मौतें नहीं रुकीं। अमर उजाला रिपोर्टर के सामने रात 10 बजे तक मौतों का सिलसिला जारी रहा। जबकि, शाम छह बजे के बाद पोस्टमार्टम नहीं किया गया। शाम 6 बजे के बाद पोस्टमार्टम करने के लिए जिलाधिकारी का आदेश जरूरी होता है, लेकिन एक बार भी जिलाधिकारी सदर अस्पताल नहीं आए और न किसी ने उनसे आदेश लेने का प्रयास किया। नतीजा यह रहा कि जहरीली शराब से जान गंवाने वाले लोगों की लाशें सदर अस्पताल में सुबह तक पड़ी रहीं और वहीं आसपास उनके परिजन भटकते रहे। पटना जाने के रास्ते में मौत के बाद लौटे जय प्रकाश सिंह के शव के आसपास मिले परिजनों ने रोते हुए बताया कि इलाज भी यहां कुछ नहीं हुआ और मरने के बाद अब पोस्टमार्टम के नाम पर गुरुवार सुबह तक इंतजार करने कहा गया है।

सिविल सर्जन ने कहा– अंतिम समय में आए ज्यादा लोग

सोमवार शाम शराब पीने के बाद से लगातार लोगों की तबीयत बिगड़ रही थी। कई लोगों को उसी रात दिखना कम हो गया था। मंगलवार को कई लोगों को दिखना पूरी तरह बंद हो गया। फिर मौत का सिलसिला शुरू हुआ, तब जाकर लोग अस्पताल पहुंचने लगे। शराबबंदी के केस में फंसने के डर से ज्यादातर लोग अस्पताल ही नहीं जा रहे थे।

ये सब मशरक क्षेत्र के लोग हैं :

1. अजय गिरी (पिता- सूरज गिरी, बहरौली),

2. चंदेश्वर साह (पिता- भिखार साह, बहरौली),

3. जगलाल साह (पिता- भरत साह, बहरौली)

4. अनिल ठाकुर (पिता- परमा ठाकुर, बहरौली)

5. सीताराम राय (पिता- सिपाही राय, बहरौली)

6. एकरारुल हक (पिता- मकसूद अंसारी, बहरौली)

7. दूधनाथ तिवारी (पिता- महावीर तिवारी, बहरौली)

8. शैलेंद्र राय (पिता- दीनानाथ राय, बहरौली)

9. हरेंद्र राम (पिता- गणेश राम, मशरक तख्त),

10. नासिर हुसैन (पिता- समसुद्दीन, मशरक तख्त),

11. भरत राम (पिता- मोहर राम, मशरक तख्त),

12. भरत साह (पिता- गोपाल साह, शास्त्री टोला),

13. रामजी साह (पिता- गोपाल साह, शास्त्री टोला),

14. कुणाल सिंह (पिता- यदु सिंह, यदु मोड़),

15. मनोज राम (पिता- लालबाबू राम, दुगरौली),

16. गोविंद राय (पिता- घिनावन राय, पचखण्डा),

17. रमेश राम (पिता- कन्हैया राम, बेन छपरा)

18. जयदेव सिंह (पिता- बिंदा सिंह, बेन छपरा),

19. ललन राम (पिता- करीमन राम, शियरभुक्का),

ये सब इसुआपुर क्षेत्र के लोग हैं :

20. संजय कुमार सिंह (पिता- वकील सिंह, डोइला, इसुआपुर),

21. अमित रंजन उर्फ रिनू (पिता- द्विजेंद्र सिन्हा, डोइला, इसुआपुर)

22. बिचेंद्र राय (पिता- नरसिंह राय, डोइला, इसुआपुर)

23. प्रेमचंद साह (पिता- मुनिलाल साह, रामपुर अटौली, इसुआपुर),

24. दिनेश ठाकुर (पिता- अशर्फी ठाकुर, महुली, इसुआपुर),

25. उपेंद्र राम (पिता- अक्षलाल राम, अमनौर)

26. उमेश राय (पिता- शिवपूजन राय, अमनौर)

27. सलाउद्दीन मियां (पिता- वकील मियां, अमनौर),

28. विक्की महतो (पिता- सुरेश महतो, मढ़ौरा),

ये वो लोग हैं जिनका पूरा पता अब उपलब्ध नहीं है :

29. मुकेश शर्मा (पिता- बच्चा शर्मा),

30. मंगल राय (पिता- गुलराज राय),

31. चंद्रमा राम (हेमराज राम),

32. मशरक के जतन साह (पिता- कृपाल साह)

33. जय प्रकाश सिंह (पिता- शशिभूषण सिंह)

34. विश्वकर्मा पटेल (पिता- श्रीनाथ पटेल)

35. सुरेन साह (पिता- जतन साह)

‘दि न्यूज़ वाला’ की पड़ताल के दौरान परिजनों से बातचीत में यह सामने आया। इस बात की तसदीक सिविल सर्जन डॉ. सागर दुलाल सिन्हा भी करते हैं। सिविल सर्जन ने कहा कि ज्यादातर लोग हालत बिगड़ने पर अस्पताल आए, इसलिए बचा पाना मुश्किल हो रहा था। एक-दूसरे की जानकारी के आधार पर समय रहते इन्हें ढूंढ़कर लाया जाता तो शायद कम जान जाती। जिसकी आंखों की रोशनी कई घंटे पहले चली गई, वह भी देर से आए। हालांकि, सिविल सर्जन के इस बयान से अलग परिजनों ने बातचीत में कहा कि अस्पताल पहुंचने के बाद भी इलाज की पर्याप्त सुविधा नहीं मिली। केस हाथ से निकलने लगा तो रेफर किया गया, जिसके कारण रेफर होने वाले भी कई लोग रास्ते में ही मर गए।

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