Film Review : दिल को छू लेने वाली है मां-बेटे की कहानी 'सलाम वेंकी'

मुंबई। दिसंबर के सेकेंड वीक के फ्राइडे पर बॉक्स ऑफिस पर काजोल की मच अवेटेड फिल्म सलाम वेंकी रिलीज हुई है। इस फिल्म में एक बीमार बेटे और उसकी मां की कहानी को दिखाया गया है। फिल्म को लोगों का शानदार रिस्पॉन्स भी देखने को मिल रहा है। इस फिल्म का निर्देशन रेवती ने किया है। वहीं इसके प्रोड्यूसर सूरज सिंह, श्रद्धा अग्रवाल, वर्षा कुकरेजा हैं। ये फिल्म ड्यूकेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के मरीज की कहानी है जो मां से इच्छा मृत्यु मांगता है।

फिल्म ‘सलाम वेंकी’ एक ऐसे लड़के की कहानी है, जो ड्यूकेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (डीएमडी) नामक दुर्लभ बीमारी से जूझ रहा है। इस बीमारी में मरीज का एक-एक अंग धीरे-धीरे काम करना बंद कर देता है। ऐसे में मरीज अधिकतम 14 साल तक जीवित रहता है, जबकि वेंकी अपनी सकारात्मक सोच के साथ 25 वर्षों तक जीवित रहा। फिल्म में वेंकी का रोल विशाल जेठवा और मां सुजाता का रोल काजोल ने निभाया है। यह मां-बेटे की इमोशनल स्टोरी पर फिल्म है।

वेंकी जीवन के आखिरी सालो में मां से इच्छा-मृत्यु और अंगदान करने की मांग करता है। सकारात्मक सोच का वेंकी अपनी मां पर और बोझ बनकर नहीं रहना चाहता। वहीं तकलीफ से छुटकारा पाने के साथ अंगदान करके कुछ लोगों को जीवन दान देना चाहता है। पहले तो बेटे की इस मांग को मां सुजाता सिरे से नकार देती है, जिससे मां-बेटे के बीच नोंकझोंक भी होती है।

लेकिन समय के साथ मां की अंतर्रात्मा बेटे की इच्छा मृत्यु को स्वीकृति दे देती है। कहानी में पेंचीदा मोड़ तब आता है, जब बेटे की इच्छा-मृत्यु के लिए मां हॉस्पिटल से लेकर कानून का दरवाजा खटखटाती है। फिर राजनीति से लेकर कोर्ट-कचहरी और मीडिया इन्वॉल्व होता है। इसके आगे की कहानी का मजा पढ़ने से ज्यादा थिएटर में फिल्म देखने पर आएगा।

करीब 12 साल के अंतराल के बाद रेवती ने निर्देशन किया है। फिल्‍म में काजोल, विशाज जेठवा, प्रकाश राज, राजीव खंडेवाल जैसे दिग्‍गज कलाकार हैं लेकिन पटकथा कमजोर होने की वजह से यह संवदेनशील विषय संवदेनाओं को झकझोर नहीं पाता है। इंटरवल से पहले पात्रों को स्‍थापित करने में लेखक और निर्देशक ने काफी समय लिया है। फिल्‍मों का शौकीन वेंकी फिल्‍मी डायलाग काफी बोलता है। यह बीच-बीच में नीरसता को तोड़ते हैं लेकिन मृत्‍युशैया पर लेटे वेंकी के दर्द को आप महसूस नहीं कर पाते हैं।

नंदिनी के साथ उसकी प्रेम कहानी मार्मिक नहीं बन पाई है। हालांकि बीच-बीच में चुनिंदा पल आते हैं जो भावुक कर जाते हैं। फिल्‍म वेंकी के जीवन सफर में ज्‍यादा नहीं जाती जबकि अंत में भारतीय शतरंज खिलाड़ी विश्वनाथन आनंद और कई गणमान्‍य के साथ उसकी असल फोटो दिखाई गई है। इच्‍छा मृत्‍यु का विषय बेहद संवेदनशील है लेकिन अदालती जिरह बहुत प्रभावी नहीं बन पाई है। विषय की गहराई में लेखक ज्‍यादा नहीं गए हैं। वहीं वेंकी के जीवन से जुड़े कई सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं।

सलाम वेंकी’ में जितने भी किरदार हैं वो ‘द लास्ट हुर्रा’ की किताब के किरदार पर ही आधारित है। रेवती ने बताया था कि आमिर खान के किरदार का उल्लेख उस किताब में नहीं है। उसे उन्‍होंने सरप्राइज पैकेज के रूप में रखा है। हालांकि आखिर तक आप यह समझने की कोशिश करते हैं कि यह किरदार है कौन। बहरहाल काजोल ने मां के संघर्ष, दर्द और संवेदनाओं को बहुत खूबसूरती से जिया है। विशाल जेठवा ने जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुके वेंकी के दर्द को समझते हुए उसकी भावनाओं, द्वंद्व और जीने की ललक को बखूबी आत्‍मसात किया है।

सहयोगी कलाकार में राजीव खंडेलवाल, प्रकाश राज, आहना कुमरा अपनी भूमिका के साथ न्‍याय करते हैं, लेकिन कमजोर पटकथा की वजह से वह प्रभावहीन हैं। वकील की भूमिका में राहुल बोस कमजोर लगे हैं। बाकी फिल्‍म का गीत संगीत बहुत प्रभावी नहीं है। वह भावनाओं के ज्‍वार को उभार नहीं पाता है। अंगदान की अहमियत भी बहुत सतही तरीके से चित्रित की गई है। अगर पटकथा कसी होती तो यह प्रेरणात्मक फिल्‍म बन सकती थी।

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